सच

 खुशियाँ कम और अरमान बहुत हैं ।

जिसे भी देखो परेशान बहुत है ।।


करीब से देखा तो निकला रेत का घर ।

मगर दूर से इसकी शान बहुत है ।।


कहते हैं सच का कोई मुकाबला नहीं ।

मगर आज झूठ की पहचान बहुत है ।।


मुश्किल से मिलता है शहर में आदमी ।

यूं तो कहने को इन्सान बहुत हैं ।।

✍🏻 आरती सुनील कदम

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