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काम की तलाश में। निकले है इस आश में गाँव, खलियानों को छोड़कर , सारे रिश्ते तोड़कर। अपनी यात्रा मोड़कर, कमाने की जुगत जोड़कर।। रोड़वेज की बसों में धक्का खाते हुए। लोकल ट्रेन में भीड़ संग गाते हुए।। काम की तलाश में। विश्वास को मुट्ठी में दबाए हुए, उत्साह को सीने से लगाए हुए। चल पड़े किसी का बोझ उठाए हुए, कर्तव्य की भुख जगाए हुए।। जिम्मेदारियों का झोला उठाए हुए उम्मीदों को जगाए हुए मै हक से काम मांगता हूं। मजबूरियों का पहाड़ खड़ा रहता सामने रात थक हार निकला फिर सुबह कमाने धक्के लगते हर रोज किसी बहाने। कच्ची नींद को आंखों में लिए अपने मै हक से काम मांगता हूं। ✍🏻 राजेश चोयल
मिट्टी का घर टूट गया। बाढ़ो से, जाड़ो से, ऊँची दहाड़ो से, मिट्टी का घर टूट गया। लगती पग -पग निराशा वाली दीमक। चिंताओं से सड़ता बुनियादी चट्टान।। आकांक्षा रूपी बोझ तले दबा घर सारा। अंतरमन दुःख से सिकुड़कर गिरता गारा ।। मिट्टी का घर टूट गया। गिरते हारकर आँसू धसती घर की दिवारे। बाहर झांको दुनिया तो टूटते दरवाजे खिड़किया।। मिट्टी का घर टूट गया। हार गए तुम अब, आवाजो से गूंजता घर। स्वयं विरूद्ध उठ रही आँधिया कंपकपाता घर ।। चुप्पी साधे मन, दीवारों की दरार बढ़ाती है। गिरा आत्मविश्वास का टुकड़ा, हवा मिट्टी उड़ाती है।। देखो मिट्टी का घर टूट गया। पर अब फिर से घर बनेगा । तो जमाना इसे सृजन कहेगा ।। आत्मविश्वास रूपी चट्टानो की बुनियाद होगी। आशाओं से भरी चिनाई होगी ।। बहता पानी चंचल सा मन होगा। उत्साह उमंग से गुथा गारा होगा।। देखो मिट्टी का घर बन गया।
अंतरमन में युद्ध चलते है ! स्वयं ही जल में तपते है !! शब्दो की सीमा से बंधे! किंचित लक्ष्य से सधे !! प्रश्नों की अविरल नदी ! उत्तर से भयभीत यदि !! अपेक्षाओं से खीची लकीरे ! उपेक्षाओ से बंधी जंजीरे !! मुग्ध आत्मचिंतन में ! अटकी गाठ बंधन में !! कसोटी पर दे कर परीक्षा ! संतो से प्राप्त लेकर दीक्षा !! तुम हो आत्म संदेह से लक्षित ! तुम हो आत्म विश्वास से रक्षित !! अंतरमन में विचार पलते है ! स्वयं ही स्वयं में खपते है !! ✍राजेश चोयल
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