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आबरू

लुटती बहन बेटियो की आबरू को, चार दीवारी की कैद से तोल रहे हो। बढ़ रहे है दरिदंगी के दानव, कौन से रामराज्य की जय बोल रहे हो।। कब तक दरिंदो को पुचकरोगे, भूले भटके कहकर। कब तक बचाओगे, कानून की दलीलों को देकर।। कोई ऐसी वैसी गलती नही, जो कानून का गुनहगार है। कोई चौराहे ढूंढ़ लो तो, फाँसी का फंदा तैयार है।। राजेश चोयल  https://www.instagram.com/choyal_rajesh/

मैं हार गया हूँ!

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मैं हार गया हूँ ! शायद तुमने खुद को खो दिया है। तभी तो निराशा से बोल दिया है।। कि मैं हार गया हूँ ! बताओ तुम किसके जंग में लड़े थे। बताओ तुम किसके संग भिड़े थे।। बताओ तुम किसे हराने आये थे। बताओ तुम किसे दिखाने आये थे।। शायद तुमने संदेह का बीज बो दिया है। तभी तो निराशा से बोल दिया है।। कि मैं हार गया हूँ ! यदि तुम्हे अपनी हार का दुख है, तो क्यों रोना है। यदि तुम्हे मंजिल की भुख है, तो स्वयं को हराना है।। जब माथे से निकली पशीने की बूंदे, तलवों पर आ जाए। अभी तो बस तपे हो, किसी रोज लहू भी जल जाए।। न तुम्हारी होड़ किसी से है। न तुम्हारी दौड़ किसी से है।। स्वयं शत्रु हो, तुम स्वयं के लक्ष्य की और। लड़ भीड़ों उपेक्षाओं की दीवारों से, जो है उस छोर।। शायद तुम स्वयं से हार गए हो। तभी तो निराशा से बोल गए हो।। कि मैं हार गया हूँ ! " अधूरी है मंजिले , आधे-अधूरे है ख्वाब। भरी है मुश्किलें राहों में, अभी डरे न जनाब।।"                                              ✍️राजेश ...

दास्तां ए इंजीनियरिंग

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 इंजीनियर की जिंदगी😌 हमें कहा गया कि 10वी पास कर लो और फिर मजे ही मजे।  हम दसवी में 88 प्रतिशत नम्बर ले आये। 90 नहीं ला सके उसका दुख था।  जिदंगी बर्बाद हो गिया वाला सीन था।  खैर  फिर ग्यारवीं में आये। हमसे कहा गया कि 12वीं में 90 परसेंट ला दो फिर मजे ही मजे। हम फिर 87 प्रतिशत ही ला सके। अब लगा जिदंगी बर्बाद हो गया।  फिर किसी ने कहा बिना IIT, NIT के क्या बनोगे इंजीनियर। हमसे कहा गया jee क्लियर करलो फिर मजे ही मजे।  हम फिर लग गए। jee नहीं क्लियर हुआ पर aieee हो गया।  NIT मिल गया। IIT नहीं मिला इसका दुःख था। इस बार लगा जिनगी अब पूरा बर्बाद हो गया।  अब 4 साल बीत गए। प्लेसमेंट हो गया। फिर हमसे किसी ने कहा कि private की नौकरी में क्या रखा है। सरकारी नौकरी लो GATE निकालो फिर मजे ही मजे। हम फिर लग गए। एक साल दो साल। पर गेट तोड़ न पाये। अर्ध सरकारी नौकरी लगी BHEL में।  हम तो बस सच बतायें तो इंजीनियर बनना चाहते थे और नयी चीज़ें बनाकर देश के लोगों की मदद करना चाहते थे। ये ज़िन्दगी हमें क्या क्या बनाती गयी और पता नहीं क्या क्या बनायेगी। पर अब इतने बार...

बेरोजगारी

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बढ़ गयी माथे उधारी, जो सब मांगने लगे। बढ़ गयी बेरोजगारी, जो सब बताने लगे ।। पिताजी जो हमारे ATM है, उनके पिन (पासवर्ड) बदल गए। जीजाजी जो हमारे लाला है, उधार देने से मना कर गए।। सब कहते "भाई" छोटा-मोटा काम ही कर लो। खाली बैठे हो,सरकारी परीक्षाओं के फार्म भर लो।। रात देरी से सोता, सुबह देर तक उठता। क्या बताए भिया, अब पड़ोसी भी पूछने लगता।। चौकीदार कहता मकान मालिक ने याद किया है। बाकि है या बिजली बिल भर दिया है।। अखबारों में पढ़ खबरे, सेव परमल फांकता । अकेला रहता हूँ, तो खिड़की से  झाँकता ।। फ़िक्र से भरी दुनिया भाग रही , "न जाने कहा जाना है" मैं तो निठल्ला हूँ जी, भगवान ही जाने "कहा मेरा ठिकाना है"       ✍🏼राजेश चोयल

अजनबी शायर

 कुछ दिन और पलट लो पन्ने किताबो के ! अधूरे है अभी बुनने घर ख्वाबो के !! ✍🏻राजेश चोयल

राष्ट्रीय बेरोजगार दिवस (17 सितम्बर)

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 उठो युवाओं ललकार दो,  कहो सरकार से रोजगार दो कहा जाता है युवा देश के भविष्य है क्यूंकि देश के भविष्य की जिम्मेदारी उन्हीं है के कंधो पर होती है, लेकिन जब युवाओं के ही भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा तो उस देश का भविष्य क्या होगा?  देश आज बहुत सारी समस्याओं से गुजर रहा है लेकिन फ़िलहाल बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या बनती जा रही है और उपर से  कोरोना जैसी महामारी, हालांकि इसका सक्षम परिवारों पर कोई असर नहीं देखने को मिल रहा, जिनको बेरोजगारी, महंगाई जैसे मुद्दे दिखाई ही नहीं देते जो सिर्फ धर्म जाति की राजनीति तक सीमित रह गए, फ़र्क तो उस इंसान या परिवार को पड़ रहा है जो दैनिक मज़दूरी करके अपना घर चलाते है अपना परिवार पाल रहे है।  और इसी बात से जोड़कर आज के मुद्दे पर कहना चाहूंगा मेरे वो दोस्त जो इन हालातो से गुजर रहे है जिन्हे उनके माता - पिता ने कहीं मजदूरी करके तो कहीं कर्ज करके  पढ़ाया ताकि कल को उनका बच्चा पढ़कर लिखकर अच्छी नौकरी करेगा अच्छी इज्जत कमाएगा घर की दशा और दिशा दोनों बदल जाएगी, और वो बच्चा इन हालातो में पढ़ भी रहा, लेकिन  सवाल कब तक? अर्जुन को...

आत्मविश्वास और धैर्य

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कंई दोस्त इस परिस्थिति से गुजर रहे होंगे,जो शायद पैसे कर्ज करके या जैसे तेसे अपनी पढ़ाई पूरी कर रहे थे इस उम्मीद में कि थोड़े दिन की बात है फिर शायद अच्छी नोकरी होगी हाथ में, लेकिन समय का कुछ कहते नहीं आता कब करवट बदल दे, और वर्तमान समय के लिए तो अब हम व्यापम को भी दोष नहीं दे सकते, बस यह समय धैर्य बनाए रखने का है हिम्मत और आत्मविश्वास  बनाए रखने का है,   ये समय भी निकल जाएगा, और अच्छा ना लगे यही सोचकर खुश होना जो लोग 1 नंबर या प्वाइंट से मेरिट से बाहर हुए है, जिनकी तैयारी इतनी ही चुकीं थी जिन्हें सिर्फ एग्जाम में बैठने का इंतजार था उनके दिन केसे निकलते होंगे,  और यही सोच लेना कि ये सिर्फ हमारे साथ ना होकर पूरी दुनिया में हो रहा है। कैलेंडर हमेशा तारीख को बदलता है, पर एक तारीख ऐसी भी आती है जो कैलेंडर को ही बदल देती है,  बस अपने समय का इंतजार  करे, और वो भी ना हो तो कोई दूसरा काम कर ले, पढ़ाई के अलावा भी बहुत से काम है जिससे अच्छे से जीवन यापन हो सकता है क्यूंकि आपका एक गलत फ़ैसला आपके मां बाप के हजारों सपने तोड़ सकता है। Be positive😊 ✍️गोपाल प्रजापत धार ...

दर्द ने ही सुकून दे दिया

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मैंने जीवन के मतलब को, मन ही मन मे सोचा था पीड़ा के धुंधले सागर में , मारा गहरा गोता था  नियति ने विष के भोगी को ,अमृत का घूँट पिला दिया। दर्द ने ही ,सुकून दे दिया। सत्य रूप की चमक दिखी,दिनभर से तपते गालो में सुख की गगरी भरी मिली ,हाथो के उभरे छालों में वक्त ने जग के अनंत ज्ञान को ,कुछ लम्हो में बता दिया। दर्द ने ही ,सुकून दे दिया। संघर्ष ही जीवन तो ,क्यो खोजे सुख को सुविधा में मैं हूँ तो सब है फिर,क्यों उलझे फिजूल दुविधा में बुरे दौर ने जीवन के हर दौर को जीना सीखा  दिया। दर्द ने ही ,सुकून दे दिया। ✍️ ghannu_sirvi

मेरे पिता के अनुभव का कर्तव्य चरित्र

अनुभव की बात वो करते है जो पत्थरो में पानी ढूंढ़ते है मुझे अनुभव चाहे वहां से  मिला हो पर मुफ्त में  अनुभव बाटने वाले से में दो दो हाथ कर सकता हूं बारिश में भीगे सिर से टपकती पानी की बूंदे भी बहुत कुछ सिखाती है  जब  गर्मी से तप्त लू के मौसम में  मकान कि टूटी छत बारिश होने पर याद आती है  तब यह सोचना चाहिए कि तुम इस संसार में अपनी आयु पूरी करने आए हो बस  जब बिना बताए कोई मुसाफिर खुली सुनसान सड़क पर चल पड़ता है तो बिजली की गड़गड़ाहट भी उसे कंपित नहीं कर  सकती  ।  पर यदि तुम बिजली के कड़कड़ाने की आवाज से ही अपने लक्ष्य को अभेद समझ लेते हो तब तुम्हें अपने भविष्य की कदाचित चिंता नहीं है  चारो तरफ  तेज ठंडी मौसमी  हवाओं में जो हवाओं को गर्म करता हुआ अपनी मंजिल की ओर नंगे पैरो से दौड़ लगाता  है तब पथ की बाधाएं और कांटे भी मुड़कर फूलों जैसे प्रतीत होते है  पर यदि तुम इन्हें  असंभव कार्यों की श्रेणी में रखते हो तो तुम अपने संभव प्रयत्नों की मृत्यु को  आव्हान करके  नष्ट हो जाओगे सदा एक पंक्ति में चल...

जाने क्या हो गया है

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      ना जाने मेरी ज़िन्दगी में ये क्या हो गया है, जो अपना था वो भी पराया हो गया है, ना जाने जीवन किस राह पर मुड़ गया है, बचपना भी जाने कहाँ खो गया है, ना जाने मेरी ज़िंदगी मे क्या हो गया है। चल रहा है किस्मत की लकीरो के रास्ते। शायद जीना है मुझे इसी तरह अपनो के वास्ते।। मेरे दोस्तों से मिले हुए एक अरसा हो गया है। ना जाने मेरी ज़िन्दगी में क्या हो गया है।।                                               ✍🏼शुभम राजोरिया                                                       इंदौर